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अपोलो 14 मिशन 1971: वो वृक्ष जो दो ग्रहों के साक्षी हैं

चांद सिर्फ चांद नहीं बल्कि मंगल तक पहुचने का एक रास्ता भी है।

अपोलो 14 मिशन 1971: वो वृक्ष जो दो ग्रहों के साक्षी हैं / Provided

साल 1972 के बाद एक बार फिर हम चांद के बारे में और जानकारी इकट्ठा करने निकल पड़े हैं। चांद सिर्फ चांद नहीं बल्कि मंगल तक पहुचने का एक रास्ता भी है। इंसान की जिज्ञासा और जीवन की आस की खोज बरसों पुरानी है। इसी जिज्ञासा के तहत चार एस्ट्रोनॉट अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा का मिशन का हिस्सा बने और फ्लोरिडा स्थित बेस से 'आर्टेमिस-2' सफलता पूर्वक लॉन्च किया गया। 

चांद पर जा रही नासा की टीम में अमेरिकी नागरिक रीड वाइजमैन, विक्टर ग्लोवर और क्रिस्टीना कोच के साथ- साथ कनाडाई नागरिक जेरेमी हैनसेन शामिल हैं। यह टीम 10 दिनों के मिशन पर निकली है। यह चंद्रमा पर उतरे बिना पृथ्वी के इस उपग्रह का चक्कर लगाएगी। ऐसा पहली  बार होगा की अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी की निचली कक्षा से बाहर निकलकर अंतरिक्ष में और गहराई तक सफर करेंगे और चांद का चक्कर लगाकर वापस लौटेंगे और इस चक्कर के पूरा होते ही वे इतिहास में सबसे ज्यादा दूरी तय करने वाले इंसान बन जाएंगे। 

चांद हमेशा से मानव जाति के मन के करीब रहा है। और वहां जीवन की आस नई नहीं है। ऐसे में बरसों पहले जब 'अपोलो 14 मिशन 1971' में किया जा रहा था तब अंतरिक्ष यात्री 'स्टूअर्ट रोजा' अलग-अलग प्रजाति के पांच वृक्षों के कुछ 500 बीज लेकर चांद पर गए थें। वैज्ञानिक दल यह देखना चाह रहे थें कि माइक्रोग्रेविटी का पेड़-पौधों पर क्या प्रभाव पड़ता है? 

चंद्रमा से आने के बाद इन कुछ बचे हुए 100 बीजों का वैज्ञानिको ने अध्यन किया और फिर 1975-1976 के बीच इनको अंकुरित किया जाने लगा। बाद में इन पौधों को जांच परख कर अमेरिका के भिन्न राज्यों में भेजा गया। अमेरिका के अलावा दूसरे देशों को भी उपहार स्वरूप कुछ पेड़ दिए गए। 

मैं स्वभाग्यशाली रही कि अमेरिका के जिन राज्यों में ये पेड़ पहुंचे उसमें एक राज्य इंडियापोलिस भी रोपा गया और अब यह घने विशाल वृक्ष के रूप में पृथ्वी पर जड़े जमाए हुए है। दुःख की बात यह है कि 2,38,855 माइल्स का सफर कर आए इन पेड़ों को अब कम हीं लोग जानते है। पर यह वृक्ष खड़ा है आज भी दो ग्रहों का साक्षी बनकर। 

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